Monday, December 28, 2009

लब पे पाबन्दी नही एहसास पे पहरा तो है

लब पे पाबन्दी नही एहसास पे पहरा तो है



फिर भी अहल-ए-दिल को अहवाल-ए-बशर कहना तो है






अपनी गैरत बेच डालें अपना मसलाक छोड दें


रहनुमाओं मे भी कुछ लोगो को ये मन्शा तो है






है जिन्हे सब से ज़्यादा दावा-ए-हुब्ब-ए-वतन


आज उन की वजह से हुब्ब-ए-वतन रुसवा तो है






बुझ रहे हैं एक एक कर के अकीकदों के दिये


इस अन्धेरे का भी लेकिन सामना करना तो है






झुठ क्यू बोलें फ़रोग-ए-मस्लहत के नाम पर


ज़िन्दगी प्यारी सही लेकिन हमे मरना तो है!

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